Thursday, 15 January 2015

अध्यात्मिक व्यक्ति ही युवा है।

अध्यात्मिक विचार वाले व्यक्ति को लोग बूढ़ा बोलते हैँ। लोग सोचते हैँ जो लुभावनी और मजेदार बात कर रहा है, जो अनेक प्रकार के ड्रेस सेँस प्रयोग कर रहा है फिल्म के विषय मेँ चर्चाएँ कर रहा है और जो आकर्षक दिख रहा है, वह युवा है। कई व्यक्ति तो उन लोगोँ को युवा बोलते हैँ जो नई उम्र मेँ शराब सिगरेट पीने लगते हैँ। परन्तु सच्चाई इससे कोसोँ दूर है। आज कल जिन लोगोँ को आप युवा समझते हैँ वह असल मेँ बुढ़े हैँ क्योँकि वे केवल अपने लिये ही सोँच रहेँ है। जिस प्रकार बुढ़ा व्यक्ति अपने शरीर को तनिक भी कष्ट नहीँ देना चाहता और अपेक्षा करता है कि दूसरे भी उनको सुख प्रदान करेँ। ठीक वही स्थिति एसे व्यक्तियोँ की होती है जो केवल अपने लिये सोच कर अपने आपको युवा दिखाना चाह रहेँ हैँ वे किसी भी तरह का कष्ट बर्दाश नहीँ कर पाते। छोटी बात पर इतना कष्ट महसूस करते हैँ जैसे लगता है कि अब इससे बड़ा दुख कुछ नहीँ कभी कभी तो एसा भी होता है की अत्महत्या के लिये भी तैयार हो जाते है। ठीक उसी तरह जैसे बूढ़ा व्यक्ति कह रहा हो की भगवान उठा लो अब दुख नहीँ सहा जाता।
वहीँ अध्यात्मिक विचारोँ के व्यक्ति के अन्दर हर तरह की परिस्थिति को झेलने की क्षमता होती है। क्योँकि उसमेँ संतोष करने की कला होती है। अतः वह युवा की भाँति प्रत्येक परिस्थिति मेँ डटा रहता हैँ उसमेँ कुछ करने की असीम शक्ति होती है। क्योकि वह अनेक प्रकार के विचरोँ एवं ईश्वरीय ग्यान से सम्पन्न रहता है। और विकट परिस्थिति मेँ भी विचलित नहीँ होता। उसके अन्दर समाज को परिवर्तित करने की असीम ऊर्जा एवं ग्यान होता है। अतः अध्यात्मिक व्यक्ति युवा है। भले वह शरीर से बूढ़ा हो।

Wednesday, 3 September 2014

ईश्वरादेश

ईश्वर के आदेश के बिना एक पत्ता भी नहीँ हिलता।
जो गलत है उसको करने के लिये ईश्वर ने स्वयं
मनुष्य शरीर मेँ संम्भावनाएँ उत्पन्न की हैँ।
ईश्वर यही देखता है कि किस मनुष्य ने उन गलत
सम्भावनाओँ को नष्ट करके अच्छे
कर्मो को किया। फिर उस मनुष्य को उसके
कर्म स्वरूप फल भी देता है। जब मनुष्य
सभी गलत सम्भावनाओँ को नष्ट करके केवल अच्छे
कर्म करता है तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है।
बाकी बुरे काम ईश्वर ने पहले से निर्धारित
किये हैँ, और समाज को सबक सिखाने के लिए उसके
विपरीत अच्छे कार्योँ की सम्भावनाएँ
भी निर्धारित की हैं। कौन
उसकी दोनो प्रकार की सम्भावनाओँ को अपने
शरीर के द्वारा किस प्रकार संयोजित करता है,
बस ईश्वर यही देखता है और उसके अनुरुप फल देता है।

Monday, 10 March 2014

महान पुरुषोँ के उद्देश्य

अतीत मेँ जितने भी महान लोग हुए एवं जितने
भी देवता अवतार लेकर इस धरा पर आये,
उनका उद्देश्य था की उनका अनुसरण करके
मनुष्य धर्म के मार्ग पर चले उनकी शिक्षाओँ
को अपने जीवन मेँ आत्मसात करेँ। परंन्तु
वर्तमान मे यदि किसी भी व्यक्ति को उन
महान पुरुषोँ के जीवन का उदाहरण देकर
समझाने की कोशिश करोगे तो लोग कहते हैँ,
कि "वो फलाना थे मैँ और आप वो नहीँ है,
वो समय चला गया, अब के समय की बात
करो अभी के समय मे कोई एसा है?" ऐसे
वाक्योँ को कहकर वे अपने मन मेँ छुपे
दुर्व्यवहारोँ को तीव्रता प्रदान करते हैँ। और
मन को अच्छा लगने वाले गलत
कार्यो को ही करते हैँ। वे उन महापुरुषोँ के
जीवन को व्यर्थ साबित करते हैँ, अवतार लेने
वाले देवताओँ की पूजा तो करते है परंतु
दूसरी तरफ उनके जीवन चरित्र को ही व्यर्थ
बताते हैँ ऐसे लोगोँ के लिये उन महान पुरुषोँ ने
व्यर्थ ही जन्म लिया था। कर्म काण्डी बनकर
सभी ने पूजा तो कर ली परंतु जो शिक्षायेँ हैँ
उनको कौन सीखेगा, ये तो वही बात हुई जिस
थाली मे खाया उसी मेँ छेद कर दिया।
जीवन तो तुम्हारा तब सफल है जब तुम अतीत मेँ
जन्मे महापुरुषोँ के शिक्षाओँ के विशाल समुद्र से
एक बूँद भी ग्रहण कर पाओ। अन्यथा जीवन
बेकार है। स्वामी विवेकानन्द, श्री कृष्ण,
महात्मा बुद्ध, एवं अनेको हैँ जिनसे तुम सीख
सकते हो पर तुम उनको पढ़ो तो, पर
उनको टालो नहीँ। तुम उन्हे ग्रहण कर सकते
हो और वैसे बन सकते हो बस आत्मविश्वास
तो लाओ।

Tuesday, 18 February 2014

इस भौतिकता में तुम कहाँ हो ?

यह सम्पूर्ण संसार भौतिक है। और मनुष्य इस
भौतिकता के पीछे ही भाग रहा है। भौतिक
भोग विलास ही मनुष्य के लिये सब कुछ है। सब
भौतिक। फिर तुम कहा हो ? तुम कहोगे ये
क्या न खड़ा हूँ या बैठा हूँ , ये मैँ ही तो हूँ।
परन्तु क्या सच मे ये तुम हो ? तुम क्या हो? ये
तुम नही तुम्हारा शरीर है तुम्हारे शरीर
का प्रत्येक अंग तुम नही होँ, वह तुमसे अलग है।
हाथ तुम नहीँ हो, पैर तुम नहीँ हो, पेट तुम
नहीँ हो, पीठ तुम नहीँ हो, नाक, कान, आँख, तुम
नही हो। ये तो तुम्हारे शरीर के बाहरी अंग हैँ।
फिर आप भीतर के अंगो की बात करोगे, कुल
मिलाकर ये शरीर के बाहरी भीतरी अंग है। पर
तुम कहाँ हो? तुम तो वो हो जिसके कारण ये
भौतिक शरीर चलता है, उठता है, बैठता है,
देखता है, सुनता है, सोचता है, तुम
ऊर्जा हो वही ऊर्जा जिसके कारण ये भौतिक
शरीर चालायमान है।
ऊर्जा ही तुम्हारी आत्मा है। बस यही तुम हो।
ईश्वर ने तुम्हे भौतिक संसार मेँ सुगमता से रहने
के लिये ये भौतिक शरीर दिया है।
इसका प्रयोग
करो इसको विलासिता का आदी मत बनाओ।
यह आत्मा परमात्मा का अंश है यह पवित्र है,
तथा ईश्वर स्वरूप है, इसको व्यर्थ मत
समझो यही तो तुम हो तुम ईश्वरीय कार्य
करो ये शरीर आत्मा के लिये प्रयोग करो।
आत्मा शरीर के लिये नहीँ शरीर आत्मा के लिये
है। इसे भौतिकता मे लिप्त मत होने दो,
यदि लिप्त हुए तो तुम्हे अपने आप का बोध
नहीँ होगा और तुम सदैव शरीर ही रह जाओगे
भौतिकता मेँ डूब जाओगे तुम कौन हो भूल जाओगे।
तुम कौन हो इसे जान लो और ईश्वरीय कार्य
करो फिर देखो कैसा आनन्द मिलता है।

Saturday, 6 April 2013

वर्तमान शिक्षा

वर्तमान समय में लोग आज छोटी सी आयु में ही प्रेम सम्बन्ध जोड़ लेते हैं मैंने भी जोड़ा था भगवन कृष्ण ने भी जोड़ा था । पर प्रेम सम्बन्ध का उद्देश्य आज के समय में क्या होता है ? भगवन श्री कृष्ण ने १४ वर्ष की आयु के उपरांत प्रेम लीला करना छोड़ दिया था और अपने कर्मो को करने लगे । कंस के वध के उपरांत उन्होंने संदीपनी मुनि से शिक्षा ग्रहण की और धर्म की रक्षा के लिए कर्म करने लगे । हमें भी उन्ही जैसा बनना चाहिए, हमें  बचपन की बातो को दिल से लगाकर जीवन भर नहीं बैठना चहिये हम एक निश्चित कार्य के लिए ही धरती पर मानव रूप में आये हैं। तो हमें अपना कार्य करना चाहिए । हमें यह विचार त्याग देना चाहिए की हमें प्रेम सम्बन्ध के लिए एक साथी चाहिए । क्योकि हे मनुष्य प्रेम सम्बन्ध बनाना बुरा नहीं पर समय से पहले बनाना यह बुरा है । पुराने समय में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली विकसित थी जहा बालक अन्य बालको के साथ रह कर शिक्षा ग्रहण करता था तथा गुरु की सेवा करता था, उसे अन्य कार्यो से कोई लेना देना नहीं था । पर आज के समय में इसका ठीक उल्टा होता है, बालक बालिकाए साथ पढ़ती है उनके पास अनुपयोगी वस्तुए भी होती हैं जैसे मोबाइल टेबलेट आदि उनका उपयोग सही दिशा में हो तो ठीक है परन्तु वे उसका उपयोग गलत दिशा में कर रहे हैं । जिससे उनमे प्रेम इच्छा नहीं बल्कि काम इच्छा उत्पन्न हो रही है । वे घर में रह कर टीवी और कंप्यूटर में न देखे जाने वाले दृश्य भी देख रहे हैं  । परन्तु पुराने समय में व्यर्थ के कार्यो के लिए बालक तथा बालिकाओं को समय ही नहीं दिया जाता था । और बालक बालिकाए अलग अलग शिक्षा ग्रहण करते थे । हमारे शास्त्रों में २५ वर्ष के उपरांत विवाह करना उचित माना जाता था और इसके पूर्व तक बालक केवल शिक्षा ही ग्रहण करता था । अतः हमें वर्तमान समय में प्रेम  सम्बन्ध २५ वर्ष के उपरांत बनाना चाहिए अथवा विवाह करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार विवाह से पहले किया गया काम अर्थात गलत इच्छाओ को करना उन्हें साकार रूप देना घोर अपराध है ।

Friday, 18 January 2013

Man Vashikaran Ek Kathin Karya.

Antar man ko ekagra chitt karne ke liye atyant dhyaan lagane ki awashyakta hoti hai anyatha man indriyon ke pravaah me tez dhara ke samaan bahta chala jata hai. ishwar roopi naiya ka milna aise tez pravaah me mushkil hota hai. atah manushya asahaay ho jata hai. man ko shaant rakhne ke liye Ishwar me dhyaan lagane ki cheshta karni chahiye. is cheshta se manushya apne man ko galat raste par jane se bhataka dega fir aap us bhatke hue man ko sahi maarg par asani se la sakte hain.
http://myblogshivpratap.blogspot.in/p/blog-page_16.html 

Wednesday, 16 November 2011

Shayri

ye raat bhi dhal gai, na jane kya kah gai, 
ek awaz suni thi shayad, jo kano me reh gai,
ansuo ki barish me, ye raat bhi guzar gai. 
Ek aah si nikal gai, ye raat bhi dhal gai.
                                      
                                    Written By:Shiv Pratap.
 
bas ek rishta nibhana tha,
wo kuch jana pehchana tha,
jise ankho se jana tha, 
mera dil dewana tha, 
wo pyar dikhana tha. 
Jo har pal mastana tha, 
ik pyar ka afsana tha, 
bus ek rishta nibhana tha, 
bus ek rishta nibhana tha...
                           
                            Written By Shiv Pratap.
 
dekhta hun main gair bahon me, 
ik jali thi laow, dekh kar unko,,, 
jal rahi thi laow, bujhgai ab wo, 
mar raha hun main sonch kar unko, 
aye khuda tu ab bulale mujhko....
bulale mujhko...
                           
                           written By : Shiv Pratap
 
ham yakeen dilate rahe apni wafa 

ka, par unke dil me koi aur tha,

wahi unke dil ka qatil nikla jo

unke dil me tha. JAb karne lage

atbar vo hamara, par ab, main mit
chuka. 
                  Written by: Shiv Pratap.