Wednesday, 14 February 2018
Friday, 16 January 2015
शादी जरूरी है क्या ?
एक
मित्र ने पुछा शादी कब करोगे? मैने कहा करना जरूरी है क्या ? तो बोले मेरा
मानना है जीवन मे कुछ करो न करो शादी जरूर करो। मैँ मौन रहा और मुसकुराता
रहा। तब फिर मित्र ने कहा, अरे शादी नहीँ करोगे तो समाज के लोग क्या कहेगे?
अब अगर मै कुछ बोलता तो अच्छा खासा उपदेश दे देता परंतु चुप रहा। सोचा कि
बेकार मे मै क्योँ उनको बोर करूँ। शान्त ही रहूँ तो अच्छा है।
शादी करो या न करो समाज का काम तो कहना ही है। तुम्हे जिसमे आनन्द आता है वो करो शादी करनी है शादी करो नहीँ करनी तो मत करो! शादी करोगे तो भी समाज कुछ न कुछ कहेगा नहीँ करोगे तो भी कहेगा। यदि शादी करोगे तो पत्नी के बारे मे बात करेगा, उसकी पत्नी गोरी है, काली है स्वभाव ठीक है या खराब है, सुशील है या नहीँ ,लड़का खुश रखता है या नही, पत्नी सास की सेवा करती है या नही, चाल चलन कैसा है, जोड़ी ठीक है या नहीँ और ना जाने क्या क्या बाते करेगा समाज। और यदि शादी नहीँ की तो भी समाज कहेगा। लड़के मे कुछ कमी होगी, अरे शादी नही की वंश कैसे बढ़ेगा, लड़का सन्यासी बनेगा क्या, कहीँ नपुंसक तो नहीँ, लड़का मर्द नहीँ है, और न जाने क्या क्या। मतलब शादी करो तो भी दिक्कत न करो तो भी दिक्कत। समाज तो बात करेगा ही फिर समाज की बात क्योँ सुने तुम्हारी जो मर्जी है वो करो जिसमेँ तुम आनन्द पाते हो वो करो। जिसमे तुम्हारी आत्मा संतुष्ट हो वो करो। जरा अतीत मे जा कर देखो कितनो ने शादी नहीँ की और सम्मान से रहे। क्या उन्हे समाज कहने जाता है कि उनमे कुछ कमी थी या नपुंसक थे या वे मर्द नहीँ थे? जरा देखो तो उनमे अपार पुरुषत्व था भीष्म, विवेकानन्द अपार पुरुषत्व से भरे थे। और जिन्होने शादी की उनमे भी अनेक श्रेष्ठ उदाहरण मिल जायेँगे जैसे महत्मा बुद्ध, अर्जुन, एसे अनेक हैँ। बस तात्पर्य इतना है कि शादी करो या न करो बस कर्म अच्छे करो। जो तुम्हारी आत्मा को आनन्द प्रदान करता है वो करो समाज क्या कहेगा ये मत विचार करो। केवल श्रेष्ठ कार्य करो । फिर समाज बोलेगा नहीँ सिर्फ तुमहारा अनुसरण करेगा।
शादी करो या न करो समाज का काम तो कहना ही है। तुम्हे जिसमे आनन्द आता है वो करो शादी करनी है शादी करो नहीँ करनी तो मत करो! शादी करोगे तो भी समाज कुछ न कुछ कहेगा नहीँ करोगे तो भी कहेगा। यदि शादी करोगे तो पत्नी के बारे मे बात करेगा, उसकी पत्नी गोरी है, काली है स्वभाव ठीक है या खराब है, सुशील है या नहीँ ,लड़का खुश रखता है या नही, पत्नी सास की सेवा करती है या नही, चाल चलन कैसा है, जोड़ी ठीक है या नहीँ और ना जाने क्या क्या बाते करेगा समाज। और यदि शादी नहीँ की तो भी समाज कहेगा। लड़के मे कुछ कमी होगी, अरे शादी नही की वंश कैसे बढ़ेगा, लड़का सन्यासी बनेगा क्या, कहीँ नपुंसक तो नहीँ, लड़का मर्द नहीँ है, और न जाने क्या क्या। मतलब शादी करो तो भी दिक्कत न करो तो भी दिक्कत। समाज तो बात करेगा ही फिर समाज की बात क्योँ सुने तुम्हारी जो मर्जी है वो करो जिसमेँ तुम आनन्द पाते हो वो करो। जिसमे तुम्हारी आत्मा संतुष्ट हो वो करो। जरा अतीत मे जा कर देखो कितनो ने शादी नहीँ की और सम्मान से रहे। क्या उन्हे समाज कहने जाता है कि उनमे कुछ कमी थी या नपुंसक थे या वे मर्द नहीँ थे? जरा देखो तो उनमे अपार पुरुषत्व था भीष्म, विवेकानन्द अपार पुरुषत्व से भरे थे। और जिन्होने शादी की उनमे भी अनेक श्रेष्ठ उदाहरण मिल जायेँगे जैसे महत्मा बुद्ध, अर्जुन, एसे अनेक हैँ। बस तात्पर्य इतना है कि शादी करो या न करो बस कर्म अच्छे करो। जो तुम्हारी आत्मा को आनन्द प्रदान करता है वो करो समाज क्या कहेगा ये मत विचार करो। केवल श्रेष्ठ कार्य करो । फिर समाज बोलेगा नहीँ सिर्फ तुमहारा अनुसरण करेगा।
Thursday, 15 January 2015
अध्यात्मिक व्यक्ति ही युवा है।
अध्यात्मिक विचार वाले व्यक्ति को लोग बूढ़ा बोलते हैँ। लोग सोचते हैँ जो
लुभावनी और मजेदार बात कर रहा है, जो अनेक प्रकार के ड्रेस सेँस प्रयोग कर
रहा है फिल्म के विषय मेँ चर्चाएँ कर रहा है और जो आकर्षक दिख रहा है, वह
युवा है। कई व्यक्ति तो उन लोगोँ को युवा बोलते हैँ जो नई उम्र मेँ शराब
सिगरेट पीने लगते हैँ। परन्तु सच्चाई इससे कोसोँ दूर है। आज कल जिन लोगोँ
को आप युवा समझते हैँ वह असल मेँ बुढ़े हैँ क्योँकि वे केवल अपने लिये ही
सोँच रहेँ है। जिस प्रकार बुढ़ा व्यक्ति अपने शरीर को तनिक भी कष्ट नहीँ
देना चाहता और अपेक्षा करता है कि दूसरे भी उनको सुख प्रदान करेँ। ठीक वही
स्थिति एसे व्यक्तियोँ की होती है जो केवल अपने लिये सोच कर अपने आपको युवा
दिखाना चाह रहेँ हैँ वे किसी भी तरह का कष्ट बर्दाश नहीँ कर पाते। छोटी
बात पर इतना कष्ट महसूस करते हैँ जैसे लगता है कि अब इससे बड़ा दुख कुछ नहीँ
कभी कभी तो एसा भी होता है की अत्महत्या के लिये भी तैयार हो जाते है। ठीक
उसी तरह जैसे बूढ़ा व्यक्ति कह रहा हो की भगवान उठा लो अब दुख नहीँ सहा
जाता।
वहीँ अध्यात्मिक विचारोँ के व्यक्ति के अन्दर हर तरह की परिस्थिति को झेलने की क्षमता होती है। क्योँकि उसमेँ संतोष करने की कला होती है। अतः वह युवा की भाँति प्रत्येक परिस्थिति मेँ डटा रहता हैँ उसमेँ कुछ करने की असीम शक्ति होती है। क्योकि वह अनेक प्रकार के विचरोँ एवं ईश्वरीय ग्यान से सम्पन्न रहता है। और विकट परिस्थिति मेँ भी विचलित नहीँ होता। उसके अन्दर समाज को परिवर्तित करने की असीम ऊर्जा एवं ग्यान होता है। अतः अध्यात्मिक व्यक्ति युवा है। भले वह शरीर से बूढ़ा हो।
वहीँ अध्यात्मिक विचारोँ के व्यक्ति के अन्दर हर तरह की परिस्थिति को झेलने की क्षमता होती है। क्योँकि उसमेँ संतोष करने की कला होती है। अतः वह युवा की भाँति प्रत्येक परिस्थिति मेँ डटा रहता हैँ उसमेँ कुछ करने की असीम शक्ति होती है। क्योकि वह अनेक प्रकार के विचरोँ एवं ईश्वरीय ग्यान से सम्पन्न रहता है। और विकट परिस्थिति मेँ भी विचलित नहीँ होता। उसके अन्दर समाज को परिवर्तित करने की असीम ऊर्जा एवं ग्यान होता है। अतः अध्यात्मिक व्यक्ति युवा है। भले वह शरीर से बूढ़ा हो।
Wednesday, 3 September 2014
ईश्वरादेश
ईश्वर के आदेश के बिना एक पत्ता भी नहीँ हिलता।
जो गलत है उसको करने के लिये ईश्वर ने स्वयं
मनुष्य शरीर मेँ संम्भावनाएँ उत्पन्न की हैँ।
ईश्वर यही देखता है कि किस मनुष्य ने उन गलत
सम्भावनाओँ को नष्ट करके अच्छे
कर्मो को किया। फिर उस मनुष्य को उसकेकर्म स्वरूप फल भी देता है। जब मनुष्य
सभी गलत सम्भावनाओँ को नष्ट करके केवल अच्छे
कर्म करता है तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है।
बाकी बुरे काम ईश्वर ने पहले से निर्धारित
किये हैँ, और समाज को सबक सिखाने के लिए उसके
विपरीत अच्छे कार्योँ की सम्भावनाएँ
भी निर्धारित की हैं। कौन
उसकी दोनो प्रकार की सम्भावनाओँ को अपने
शरीर के द्वारा किस प्रकार संयोजित करता है,
बस ईश्वर यही देखता है और उसके अनुरुप फल देता है।
जो गलत है उसको करने के लिये ईश्वर ने स्वयं
मनुष्य शरीर मेँ संम्भावनाएँ उत्पन्न की हैँ।
ईश्वर यही देखता है कि किस मनुष्य ने उन गलत
सम्भावनाओँ को नष्ट करके अच्छे
कर्मो को किया। फिर उस मनुष्य को उसकेकर्म स्वरूप फल भी देता है। जब मनुष्य
सभी गलत सम्भावनाओँ को नष्ट करके केवल अच्छे
कर्म करता है तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है।
बाकी बुरे काम ईश्वर ने पहले से निर्धारित
किये हैँ, और समाज को सबक सिखाने के लिए उसके
विपरीत अच्छे कार्योँ की सम्भावनाएँ
भी निर्धारित की हैं। कौन
उसकी दोनो प्रकार की सम्भावनाओँ को अपने
शरीर के द्वारा किस प्रकार संयोजित करता है,
बस ईश्वर यही देखता है और उसके अनुरुप फल देता है।
Monday, 10 March 2014
महान पुरुषोँ के उद्देश्य
अतीत मेँ जितने भी महान लोग हुए एवं जितने
भी देवता अवतार लेकर इस धरा पर आये,
उनका उद्देश्य था की उनका अनुसरण करके
मनुष्य धर्म के मार्ग पर चले उनकी शिक्षाओँ
को अपने जीवन मेँ आत्मसात करेँ। परंन्तु
वर्तमान मे यदि किसी भी व्यक्ति को उन
महान पुरुषोँ के जीवन का उदाहरण देकर
समझाने की कोशिश करोगे तो लोग कहते हैँ,
कि "वो फलाना थे मैँ और आप वो नहीँ है,
वो समय चला गया, अब के समय की बात
करो अभी के समय मे कोई एसा है?" ऐसे
वाक्योँ को कहकर वे अपने मन मेँ छुपे
दुर्व्यवहारोँ को तीव्रता प्रदान करते हैँ। और
मन को अच्छा लगने वाले गलत
कार्यो को ही करते हैँ। वे उन महापुरुषोँ के
जीवन को व्यर्थ साबित करते हैँ, अवतार लेने
वाले देवताओँ की पूजा तो करते है परंतु
दूसरी तरफ उनके जीवन चरित्र को ही व्यर्थ
बताते हैँ ऐसे लोगोँ के लिये उन महान पुरुषोँ ने
व्यर्थ ही जन्म लिया था। कर्म काण्डी बनकर
सभी ने पूजा तो कर ली परंतु जो शिक्षायेँ हैँ
उनको कौन सीखेगा, ये तो वही बात हुई जिस
थाली मे खाया उसी मेँ छेद कर दिया।
जीवन तो तुम्हारा तब सफल है जब तुम अतीत मेँ
जन्मे महापुरुषोँ के शिक्षाओँ के विशाल समुद्र से
एक बूँद भी ग्रहण कर पाओ। अन्यथा जीवन
बेकार है। स्वामी विवेकानन्द, श्री कृष्ण,
महात्मा बुद्ध, एवं अनेको हैँ जिनसे तुम सीख
सकते हो पर तुम उनको पढ़ो तो, पर
उनको टालो नहीँ। तुम उन्हे ग्रहण कर सकते
हो और वैसे बन सकते हो बस आत्मविश्वास
तो लाओ।
भी देवता अवतार लेकर इस धरा पर आये,
उनका उद्देश्य था की उनका अनुसरण करके
मनुष्य धर्म के मार्ग पर चले उनकी शिक्षाओँ
को अपने जीवन मेँ आत्मसात करेँ। परंन्तु
वर्तमान मे यदि किसी भी व्यक्ति को उन
महान पुरुषोँ के जीवन का उदाहरण देकर
समझाने की कोशिश करोगे तो लोग कहते हैँ,
कि "वो फलाना थे मैँ और आप वो नहीँ है,
वो समय चला गया, अब के समय की बात
करो अभी के समय मे कोई एसा है?" ऐसे
वाक्योँ को कहकर वे अपने मन मेँ छुपे
दुर्व्यवहारोँ को तीव्रता प्रदान करते हैँ। और
मन को अच्छा लगने वाले गलत
कार्यो को ही करते हैँ। वे उन महापुरुषोँ के
जीवन को व्यर्थ साबित करते हैँ, अवतार लेने
वाले देवताओँ की पूजा तो करते है परंतु
दूसरी तरफ उनके जीवन चरित्र को ही व्यर्थ
बताते हैँ ऐसे लोगोँ के लिये उन महान पुरुषोँ ने
व्यर्थ ही जन्म लिया था। कर्म काण्डी बनकर
सभी ने पूजा तो कर ली परंतु जो शिक्षायेँ हैँ
उनको कौन सीखेगा, ये तो वही बात हुई जिस
थाली मे खाया उसी मेँ छेद कर दिया।
जीवन तो तुम्हारा तब सफल है जब तुम अतीत मेँ
जन्मे महापुरुषोँ के शिक्षाओँ के विशाल समुद्र से
एक बूँद भी ग्रहण कर पाओ। अन्यथा जीवन
बेकार है। स्वामी विवेकानन्द, श्री कृष्ण,
महात्मा बुद्ध, एवं अनेको हैँ जिनसे तुम सीख
सकते हो पर तुम उनको पढ़ो तो, पर
उनको टालो नहीँ। तुम उन्हे ग्रहण कर सकते
हो और वैसे बन सकते हो बस आत्मविश्वास
तो लाओ।
Tuesday, 18 February 2014
इस भौतिकता में तुम कहाँ हो ?
यह सम्पूर्ण संसार भौतिक है। और मनुष्य इस
भौतिकता के पीछे ही भाग रहा है। भौतिक
भोग विलास ही मनुष्य के लिये सब कुछ है। सब
भौतिक। फिर तुम कहा हो ? तुम कहोगे ये
क्या न खड़ा हूँ या बैठा हूँ , ये मैँ ही तो हूँ।
परन्तु क्या सच मे ये तुम हो ? तुम क्या हो? ये
तुम नही तुम्हारा शरीर है तुम्हारे शरीर
का प्रत्येक अंग तुम नही होँ, वह तुमसे अलग है।
हाथ तुम नहीँ हो, पैर तुम नहीँ हो, पेट तुम
नहीँ हो, पीठ तुम नहीँ हो, नाक, कान, आँख, तुम
नही हो। ये तो तुम्हारे शरीर के बाहरी अंग हैँ।
फिर आप भीतर के अंगो की बात करोगे, कुल
मिलाकर ये शरीर के बाहरी भीतरी अंग है। पर
तुम कहाँ हो? तुम तो वो हो जिसके कारण ये
भौतिक शरीर चलता है, उठता है, बैठता है,
देखता है, सुनता है, सोचता है, तुम
ऊर्जा हो वही ऊर्जा जिसके कारण ये भौतिक
शरीर चालायमान है।
ऊर्जा ही तुम्हारी आत्मा है। बस यही तुम हो।
ईश्वर ने तुम्हे भौतिक संसार मेँ सुगमता से रहने
के लिये ये भौतिक शरीर दिया है।
इसका प्रयोग
करो इसको विलासिता का आदी मत बनाओ।
यह आत्मा परमात्मा का अंश है यह पवित्र है,
तथा ईश्वर स्वरूप है, इसको व्यर्थ मत
समझो यही तो तुम हो तुम ईश्वरीय कार्य
करो ये शरीर आत्मा के लिये प्रयोग करो।
आत्मा शरीर के लिये नहीँ शरीर आत्मा के लिये
है। इसे भौतिकता मे लिप्त मत होने दो,
यदि लिप्त हुए तो तुम्हे अपने आप का बोध
नहीँ होगा और तुम सदैव शरीर ही रह जाओगे
भौतिकता मेँ डूब जाओगे तुम कौन हो भूल जाओगे।
तुम कौन हो इसे जान लो और ईश्वरीय कार्य
करो फिर देखो कैसा आनन्द मिलता है।
भौतिकता के पीछे ही भाग रहा है। भौतिक
भोग विलास ही मनुष्य के लिये सब कुछ है। सब
भौतिक। फिर तुम कहा हो ? तुम कहोगे ये
क्या न खड़ा हूँ या बैठा हूँ , ये मैँ ही तो हूँ।
परन्तु क्या सच मे ये तुम हो ? तुम क्या हो? ये
तुम नही तुम्हारा शरीर है तुम्हारे शरीर
का प्रत्येक अंग तुम नही होँ, वह तुमसे अलग है।
हाथ तुम नहीँ हो, पैर तुम नहीँ हो, पेट तुम
नहीँ हो, पीठ तुम नहीँ हो, नाक, कान, आँख, तुम
नही हो। ये तो तुम्हारे शरीर के बाहरी अंग हैँ।
फिर आप भीतर के अंगो की बात करोगे, कुल
मिलाकर ये शरीर के बाहरी भीतरी अंग है। पर
तुम कहाँ हो? तुम तो वो हो जिसके कारण ये
भौतिक शरीर चलता है, उठता है, बैठता है,
देखता है, सुनता है, सोचता है, तुम
ऊर्जा हो वही ऊर्जा जिसके कारण ये भौतिक
शरीर चालायमान है।
ऊर्जा ही तुम्हारी आत्मा है। बस यही तुम हो।
ईश्वर ने तुम्हे भौतिक संसार मेँ सुगमता से रहने
के लिये ये भौतिक शरीर दिया है।
इसका प्रयोग
करो इसको विलासिता का आदी मत बनाओ।
यह आत्मा परमात्मा का अंश है यह पवित्र है,
तथा ईश्वर स्वरूप है, इसको व्यर्थ मत
समझो यही तो तुम हो तुम ईश्वरीय कार्य
करो ये शरीर आत्मा के लिये प्रयोग करो।
आत्मा शरीर के लिये नहीँ शरीर आत्मा के लिये
है। इसे भौतिकता मे लिप्त मत होने दो,
यदि लिप्त हुए तो तुम्हे अपने आप का बोध
नहीँ होगा और तुम सदैव शरीर ही रह जाओगे
भौतिकता मेँ डूब जाओगे तुम कौन हो भूल जाओगे।
तुम कौन हो इसे जान लो और ईश्वरीय कार्य
करो फिर देखो कैसा आनन्द मिलता है।
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